मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले की विजयपुर तहसील में पदस्थ और अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चा में रहने वाली तहसीलदार अमिता सिंह तोमर की मुश्किलें बढ़ गई हैं। वर्ष 2021 के बहुचर्चित बाढ़ राहत घोटाले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। मंगलवार को कोर्ट नंबर 13 में हुई सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट कहा कि आरोपी को राहत देने के लिए कोई ठोस आधार नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने इस प्रकरण से जुड़े सभी लंबित आवेदनों का भी निपटारा कर दिया।

इससे पहले अमिता सिंह तोमर ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया था, जिसे वहां भी खारिज कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर राहत की मांग की, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने भी आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब उनकी गिरफ्तारी की संभावना बढ़ गई है। पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। जांच एजेंसियां मामले के अन्य पहलुओं और संभावित संलिप्त लोगों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं। माना जा रहा है कि इस घोटाले के तार कई अधिकारियों और बिचौलियों तक जुड़े हो सकते हैं, जिससे राजस्व विभाग में भी हलचल तेज हो गई है।

यह मामला वर्ष 2021 में आई भीषण बाढ़ के बाद राहत राशि वितरण से जुड़ा है। बड़ौदा तहसील क्षेत्र में 794 प्रभावित हितग्राहियों का आकलन किया गया था। सरकार द्वारा आर्थिक सहायता दी जानी थी, लेकिन जांच में सामने आया कि 127 फर्जी बैंक खातों में लगभग 2 करोड़ 57 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए गए।

ऑडिट में गड़बड़ी सामने आने के बाद जांच शुरू हुई। प्रारंभिक जांच में कई स्तरों पर अनियमितताएं पाई गईं। तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर की जांच के बाद कई लोगों को आरोपी बनाया गया और कुछ मामलों में राशि की वसूली भी की गई।



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विस्तृत जांच तत्कालीन एसडीओपी प्रवीण अष्ठाना ने की, जिसमें 25 पटवारियों सहित कुल 110 लोगों को आरोपी बनाया गया। इसी सूची में अमिता सिंह तोमर का नाम भी शामिल था, जो उस समय बड़ौदा में तहसीलदार थीं। जांच में उनके परिजनों के खातों में भी संदिग्ध लेन-देन के संकेत मिले, जिससे मामला और गंभीर हो गया।

बड़ौदा थाना पुलिस ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया है। आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए राहत वितरण में अनियमितताओं को बढ़ावा दिया और सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद आरोपी के पास सीमित विकल्प बचते हैं। ऐसी स्थिति में आमतौर पर आरोपी को आत्मसमर्पण करना होता है, जिसके बाद वह नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रशासन और पुलिस महकमे में हलचल तेज है और आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।



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