इंदौर के सबसे व्यस्त मार्ग एबी रोड पर बन रहे एलिवेटेड कॉरिडोर के भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रोजेक्ट की उपयोगिता और नियोजन पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने सरकार और संबंधित विभाग से तीखे लहजे में पूछा है कि बिना किसी ठोस और विस्तृत सर्वे रिपोर्ट के इतने बड़े निर्माण को अंजाम क्यों दिया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने सरकार से जवाब तलब किया है और अगली सुनवाई के लिए 2 अप्रैल की तारीख तय की है।

 

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पीडब्ल्यूडी के अपने ही पुराने सर्वे के अनुसार यह कॉरिडोर महज 18 प्रतिशत ट्रैफिक के लिए ही उपयोगी साबित होगा। याचिकाकर्ता अतुल शेठ की ओर से तर्क दिया गया कि जब यह प्रोजेक्ट यातायात की बड़ी समस्या का समाधान ही नहीं कर पा रहा है, तो जनता के करोड़ों रुपये इस पर क्यों व्यर्थ किए जा रहे हैं।

याचिका में रोटरी की प्लानिंग को भी गलत बताया गया है। कोर्ट ने अफसरों को निर्देशित किया है कि वे याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए तकनीकी पक्षों और आपत्तियों का गंभीरता से अध्ययन करें और उनका उचित निराकरण सुनिश्चित करें।

 

याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी है कि रिंग रोड पर वर्तमान में चार ब्रिज तैयार हो चुके हैं और दो अन्य का निर्माण तेजी से चल रहा है। इन ब्रिजों के पूरी तरह शुरू होने के बाद राजीव गांधी प्रतिमा की ओर जाने वाला अधिकांश ट्रैफिक रिंग रोड पर शिफ्ट हो जाएगा, जिससे एलिवेटेड कॉरिडोर की प्रासंगिकता और भी कम हो जाएगी।

इसके अलावा प्रोजेक्ट की लागत पर भी सवाल उठाए गए हैं। वर्ष 2019 में जो प्रोजेक्ट 350 करोड़ रुपये का था, उसकी लागत अब बढ़कर 500 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। कोर्ट ने पूछा है कि इतने वर्षों बाद पुराने टेंडर के आधार पर काम कैसे किया जा रहा है और बढ़ी हुई लागत को मंजूरी कैसे मिली। गौरतलब है कि एलआईजी गुरुद्वारे से नवलखा तक बनने वाले इस 6 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर के लिए पूर्व में निर्मित बीआरटीएस को भी हटा दिया गया है। अब प्रशासन को अगली सुनवाई में इन तमाम बिंदुओं पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।



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