महाशिवरात्रि के अवसर पर राजधानी भोपाल धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से अहम घटनाक्रम का साक्षी बना। किन्नर वैष्णव अखाड़ा द्वारा आयोजित किन्नर धर्म सम्मेलन में हिमांगी सखी को देश की पहली किन्नर शंकराचार्य के रूप में विधिवत अभिषिक्त किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार और संत-महात्माओं की उपस्थिति में संपन्न इस समारोह ने किन्नर समाज के भीतर धार्मिक नेतृत्व को नई पहचान दी।आयोजकों के अनुसार राजस्थान स्थित पुष्कर को पहली किन्नर शंकराचार्य पीठ के रूप में स्थापित किया गया है। हिमांगी सखी, जो मां वैष्णो किन्नर अखाड़ा की प्रमुख और पहली किन्नर भागवत कथा वाचक के रूप में जानी जाती हैं, अब इसी पीठ से धार्मिक दायित्व निभाएंगी। वे पहले महामंडलेश्वर और जगद्गुरु पद पर भी रह चुकी हैं।


सम्मेलन में नई धार्मिक संरचना की घोषणा

कार्यक्रम में किन्नर परंपरा के तहत चार जगद्गुरु और पांच महामंडलेश्वरों की भी घोषणा की गई। भोपाल, राजस्थान और महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों से प्रतिनिधियों की मौजूदगी में नई धार्मिक संरचना का ऐलान किया गया। आयोजन में किन्नर अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास समेत कई संत उपस्थित रहे।

घर वापसी का दावा

सम्मेलन के दौरान आयोजकों ने 60 धर्मांतरित किन्नरों की पुनः हिंदू धर्म में वापसी का दावा भी किया। मंच से कहा गया कि शुद्धिकरण प्रक्रिया के बाद उन्होंने सनातन परंपरा को दोबारा स्वीकार किया है। हालांकि इस दावे की प्रशासनिक पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हो सकी है।

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बयान से बढ़ी चर्चा

पट्टाभिषेक के बाद हिमांगी सखी ने किन्नर समाज को संगठित करने और देशभर में पीठों की स्थापना की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि शंकराचार्य पद को लेकर यदि किसी को आपत्ति है तो वे शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित हैं। उनके कुछ बयानों के बाद कार्यक्रम धार्मिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया।

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पृष्ठभूमि में रहा गद्दी विवाद

गौरतलब है कि हाल के दिनों में भोपाल में किन्नर समाज के भीतर धर्म परिवर्तन और नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए थे। ऐसे समय में महाशिवरात्रि पर आयोजित यह सम्मेलन किन्नर समाज के भीतर नई धार्मिक संरचना और एकजुटता के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

महाशिवरात्रि के दिन हुए इस आयोजन ने जहां एक ओर धार्मिक परंपरा में नई पहल की, वहीं किन्नर समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श को भी नई दिशा देने की कोशिश की।



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