10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस मनाया जाता है। भारत जैसे देश में पौष्टिकता का मुख्य स्रोत दालें ही हैं। पांच दशक से भी अधिक समय पूर्व निर्मित फिल्म ज्वार भाटा में प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने गीत गाया था, जिसमें कहा गया था-‘ये समझो और समझाओ, थोड़ी में मौज मनाओ, दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ।’ इस गीत से स्पष्ट है कि दाल रोटी को सादगी और पौष्टिकता का पर्याय माना जाता है, लेकिन महंगाई के चलते प्रोटीन का यह प्रमुख आधार थाली से दूर होती जा रहा है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार दाल उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे और किसानों को दलहन फसलों की बोवनी के लिए प्रोत्साहित करें।
दलहन उत्पादन में मध्य प्रदेश अव्वल
दलहनों के प्रति किसानों में जागरूकता लाने के लिए मध्य प्रदेश इस वर्ष कृषक कल्याण वर्ष ‘बीज से बाजार तक’ की थीम पर मना रहा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक देश में दलहन उत्पादन का 350 लाख टन लक्ष्य निर्धारित किया है। सरकार यह भी चाहती है कि दलहन उत्पादन में देश आत्मनिर्भर बने, अभी हमें दालें विदेशों से आयात करना पड़ती है। देश में दलहन उत्पादन में मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर है।
दाल को कर मुक्त किया
देश में मूंग को छोड़कर अन्य दालों का उत्पादन भी लगातार घट रहा है। आपूर्ति में भी तकलीफें आ रही हैं, इसलिए सरकार भी चाहती है कि हम दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनें। सरकार की योजना है कि आगामी दिनों में एक हजार से अधिक दाल मिलें देश में आरंभ की जाएं, जिसमें 55 से अधिक दाल मिलें मध्य प्रदेश में स्थापित हों। मध्य प्रदेश में वर्तमान में करीब एक हजार दाल मिलें कार्यरत हैं। प्रदेश सरकार ने तुवर दाल को तीन माह पूर्व ही कर मुक्त किया है।
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उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा 25 प्रतिशत
देश में दालों की औसत उत्पादकता 926 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि मध्य प्रदेश का आंकड़ा 1200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। देश में कुल उत्पादित दालों में प्रदेश का हिस्सा करीब 25 प्रतिशत का है, इसलिए केंद्र का कृषि विभाग भी देश में मध्य प्रदेश मॉडल को दालों के उत्पादन के मामले में मुख्य आधार बनाना चाहता है।
क्यों और कब से मनाया जाता है दलहन दिवस
विश्व दलहन दिवस की घोषणा वर्ष 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक संकल्प पारित कर की थी। संकल्प में कहा था कि 10 फरवरी को प्रतिवर्ष विश्व दलहन दिवस के रूप में मनाया जाएगा। विश्व दलहन दिवस मनाए जाने के विचार से कई देश सहमत हुए थे। दलहन दिवस मनाए जाने का मुख्य उद्देश्य दालों में पाए जाने वाले पौष्टिक तत्वों से जागरूक कराना था। दालों में अधिक पोषण तत्व होने से यह कुपोषण रोकने में सहायक होती है।
क्या कहते हैं किसान
हरदा जिले के कृषक शिवपाल सिंह चावड़ा का दलहनों को लेकर कहना है कि किसानों का नकद फसलों के साथ जल्दी पकने वाली फसलों की ओर अधिक झुकाव रहता है। तुवर की फसल को बोआई से कटाई तक करीब आठ माह का समय लगता है, इसलिए किसान तुवर सिर्फ अपने उपयोग उतनी ही बोते हैं। चूंकि मूंग जल्द पक जाती है, इसलिए किसान मूंग बोते हैं। चने की फसल गेहूं के साथ बो दी जाती है। तुवर का भाव भी अपेक्षाकृत कम मिलता है, इसलिए किसान तुवर जो अधिक पौष्टिक रहती है उसकी बहुत ही कम उपज लेते हैं।
सांवेर के दर्जी कराड़िया के बद्रीलाल पांचाल का कहना है कि सोयाबीन, गेहूं, चने की फसल बोते हैं। कभी मूंग भी बो लेते हैं। उपज में अधिक समय लगने के कारण हम तुवर को नहीं बोते हैं।
