संयुक्त राष्ट्र में जय श्री राम के उद्घोष और भारतीय दलितों की स्थिति को वैश्विक मंच पर बेहतर बताने वाली इंदौर की प्रख्यात पीएचडी स्कॉलर डॉ. रोहिणी घावरी एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान भारत के राष्ट्रीय ध्वज की अनुपस्थिति को लेकर सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं। रोहिणी ने एक्स प्लेटफॉर्म पर अपनी पोस्ट के जरिए इस स्थिति पर हैरानी और निराशा व्यक्त की है।

मुख्य कॉन्फ्रेंस हॉल से तिरंगा गायब होने पर जताई नाराजगी

डॉ. रोहिणी घावरी ने दावोस से एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भारत का प्रतिनिधित्व हमेशा की तरह इस बार भी बेहद प्रभावशाली रहा है। हालांकि उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई कि दावोस के उस मुख्य कॉन्फ्रेंस हॉल में भारत का झंडा मौजूद नहीं था जहां डोनाल्ड ट्रंप और अन्य वैश्विक नेताओं ने सभा को संबोधित किया। रोहिणी ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्या कारण रहा कि इस महत्वपूर्ण स्थान पर हमारे देश के गौरव तिरंगे को जगह नहीं मिली।

पाकिस्तान के झंडे की मौजूदगी पर व्यक्त की निराशा

रोहिणी ने अपनी पोस्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया कि जहां भारत का झंडा नदारद था, वहीं पाकिस्तान जैसे देश का ध्वज वहां तीसरे नंबर पर प्रदर्शित हो रहा था। उन्होंने कहा कि भारत का झंडा न होना जितनी निराशा की बात है, उससे कहीं अधिक दुख इस बात का है कि वहां पाकिस्तान का झंडा लगा हुआ था। उनके अनुसार दावोस और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच पर पाकिस्तान की स्थिति भारत की तुलना में कहीं भी नहीं ठहरती है, फिर भी वहां की व्यवस्था में यह अंतर स्पष्ट दिखाई दिया।

आर्थिक शक्ति के रूप में भारत का बढ़ता प्रभाव

रोहिणी ने अपने ट्वीट में प्रधानमंत्री कार्यालय को टैग करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान में पूरी दुनिया भारत को एक नई उम्मीद के रूप में देख रही है। उन्होंने उल्लेख किया कि भारत जल्द ही यूरोपीय संघ के साथ एक बहुत बड़ा समझौता करने जा रहा है जिससे यूरोपीय देशों की चीन पर निर्भरता कम होगी। इस आयोजन में भारत के दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति को उन्होंने देश की बढ़ती ताकत का प्रमाण बताया, लेकिन कांग्रेस सेंटर पर झंडे की कमी को खटकने वाला बताया।

संघर्षों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर

इंदौर के एक साधारण वाल्मीकि परिवार से आने वाली डॉ. रोहिणी घावरी की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है। उनके पिता इंदौर के बीमा अस्पताल में सफाई कर्मचारी हैं। रोहिणी ने अपनी मेहनत से स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी से पीएचडी के लिए एक करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप प्राप्त की और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। वह पिछले पांच वर्षों से स्विट्जरलैंड में यूएन स्कॉलर के रूप में सक्रिय हैं और सामाजिक कार्यों के लिए अपना एनजीओ भी संचालित करती हैं।



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