इंदौर के प्रमुख बाइकिंग ग्रुप राइड्स ऑफ राइडर्स ने नए साल की अपनी पहली आधिकारिक राइड को बेहद यादगार और ऐतिहासिक बनाया। ग्रुप के सदस्यों ने इस बार मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित श्री धर्मराजेश्वर मंदिर और धमनार बौद्ध गुफाओं का चयन किया। इन स्थानों को अपनी अद्भुत वास्तुकला के कारण मध्य प्रदेश का एलोरा भी कहा जाता है। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की छिपी हुई ऐतिहासिक विरासत को एक्सप्लोर करना और सुरक्षित राइडिंग का संदेश देना था।

470 किलोमीटर का सफर तय किया

ग्रुप एडमिन ज्ञानदीप श्रीवास्तव ने जानकारी देते हुए बताया कि इस रोमांचक सफर में कुल 30 राइडर्स ने हिस्सा लिया। यात्रा की सुरक्षा और अनुशासन को सुनिश्चित करने के लिए इसका नेतृत्व अनुभवी राइडर मारुत राज मिश्रा ने किया। मारुत राज मिश्रा को फेडरेशन ऑफ मोटर स्पोर्ट्स क्लब्स ऑफ इंडिया (FMSCI) से आधिकारिक सर्टिफिकेशन प्राप्त है, जिससे राइडर्स का मनोबल और सुरक्षा दोनों मजबूत रहे। इंदौर से प्रस्थान कर धर्मराजेश्वर पहुंचने और पुनः वापस लौटने तक राइडर्स ने कुल 470 किलोमीटर की दूरी तय की। विशेष बात यह रही कि इतनी लंबी दूरी को एक ही दिन में सुबह जाकर शाम तक सुरक्षित रूप से पूरा कर लिया गया।

इस तरह पहुंचें

इंदौर से धर्मराजेश्वर पहुंचने के लिए राइडर्स ने क्षिप्रा के रास्ते गरोठ रोड का चयन किया। इस मार्ग पर उज्जैन शहर के ट्रैफिक से बचने के लिए बाईपास का सहारा लिया गया, जिससे सीधे गरोठ तक का सफर आसान हो गया। इसके बाद शामगढ़ होते हुए राइडर्स अपने गंतव्य तक पहुंचे। यह क्षेत्र वर्तमान में एक बड़े पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहा है, जहां देशभर से लोग प्राचीन वास्तुकला को देखने आते हैं। शांति और इतिहास से भरे इस स्थान को परिवार के साथ घूमने के लिए सबसे उपयुक्त स्थलों में से एक माना जाता है।

वास्तुकला का बेजोड़ नमूना

धर्मराजेश्वर मंदिर को मध्य प्रदेश में रॉक-कट वास्तुकला का एक छिपा हुआ रत्न माना जाता है। इस मोनोलिथिक मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे पूरी तरह से एक ही विशाल चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर तराश कर बनाया गया है। प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का यह अद्भुत प्रमाण मंदसौर के चंदवासा गांव के पास स्थित है। एलोरा के कैलाश मंदिर से मिलती-जुलती इसकी बनावट पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। 170 फीट लंबे और 66 फीट चौड़े इस परिसर में मुख्य मंदिर के साथ सात अन्य छोटे मंदिर भी स्थित हैं। प्रारंभ में यह भगवान विष्णु को समर्पित था, जिसे बाद में शिव मंदिर के रूप में पहचान मिली।

धमनार बौद्ध गुफाएं: इतिहास और अध्यात्म का संगम

मंदिर परिसर के पास ही स्थित धमनार बौद्ध गुफाएं इस यात्रा का दूसरा प्रमुख आकर्षण रहीं। यहां 51 चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं का एक विशाल समूह है, जिन्हें 5वीं से 7वीं शताब्दी के दौरान लेटराइट पहाड़ियों में तराशा गया था। ये गुफाएं उस समय की गवाह हैं जब मालवा क्षेत्र में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था। यहां के मठवासी कक्ष, विहार और प्रार्थना कक्ष (चैत्य) प्राचीन कारीगरों के कौशल को दर्शाते हैं। मुंबई की कन्हेरी गुफाओं के समान उद्देश्य वाली ये गुफाएं अपनी विशिष्ट लाल रंग की लेटराइट चट्टानों के कारण एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती हैं।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed