स्कूल शिक्षा विभाग एवं आदिम जाति कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित स्कूलों, छात्रावासों और आश्रमों में वर्षों से कार्यरत अंशकालीन एवं अस्थायी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का सब्र आखिरकार टूट गया। 15 से 20 साल तक लगातार सेवा देने के बावजूद मात्र 5,000 रुपये मासिक वेतन मिलने से नाराज कर्मचारियों ने सोमवार को  डीपीआई कार्यालय का घेराव कर जोरदार प्रदर्शन किया।

प्रतिदिन 10-12 घंटे काम लिया जाता है

प्रदर्शनकारी कर्मचारियों ने शासन और विभागीय अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनसे प्रतिदिन 10-12 घंटे काम लिया जाता है, लेकिन बदले में न तो न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है और न ही किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा। कर्मचारियों का कहना है कि नियमित कर्मचारियों की तरह जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद उन्हें आज भी अंशकालीन और अस्थायी बताकर शोषण किया जा रहा है।

स्थिति दिहाड़ी मजदूरों से भी बदतर

कर्मचारियों ने बताया कि कई साथी 15-20 वर्षों से स्कूलों और छात्रावासों में सेवाएं दे रहे हैं, फिर भी उनकी स्थिति दिहाड़ी मजदूरों से भी बदतर है। कई बार महीनों की देरी से वेतन मिलता है, जिससे परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। प्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों ने हाथों में तख्तियां लेकर “न्यूनतम वेतन दो “स्थायी करो न्याय दो और “शोषण बंद करो जैसे नारे लगाए।

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सुप्रीम कोर्ट का दिया हवाला

प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के सिविल अपील क्रमांक 8558/2018 (निर्णय 19 अगस्त 2025) का हवाला देते हुए कहा कि अदालत स्पष्ट कर चुकी है कि लंबे समय तक अस्थायी कर्मचारियों से नियमित काम लेना शोषण है और समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर आदेशों की अनदेखी की जा रही है।

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आंदोलन को और तेज किया जाएगा

कर्मचारियों ने मांग की कि अंशकालीन एवं अस्थायी कर्मचारियों के लिए स्पष्ट सेवा शर्तें लागू की जाएं, 15-20 वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों को तत्काल स्थायी किया जाए और उन्हें न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा तथा शासकीय कर्मचारियों के समान वेतन-भत्ते दिए जाएं। डीपीआई कार्यालय घेराव के दौरान कर्मचारियों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।



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