मध्यप्रदेश की जेलों में बंद कैदियों की स्थिति को लेकर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्य सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। NCRB की प्रिजन रिपोर्ट और संसद में दिए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश की जेलें भीषण भीड़भाड़ और सामाजिक असमानता का प्रतीक बन चुकी हैं। प्रदेश की 132 जेलों में वर्तमान में 45,543 कैदी बंद हैं, जो देश में तीसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। जबकि जेलों की कुल क्षमता लगभग 30 हजार की है। इस तरह प्रदेश की जेलों में क्षमता से 152 प्रतिशत अधिक कैदी रखे गए हैं, जिससे व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं।

एमपी की जेलों की मौजूदा स्थिति

मध्यप्रदेश में कुल 132 जेलें संचालित हैं। इनमें 45,543 कैदी बंद हैं, जबकि जेलों की स्वीकृत क्षमता लगभग 30 हजार की है। इस कारण प्रदेश की जेलें 152 प्रतिशत से अधिक क्षमता पर चल रही हैं। नेता प्रतिपक्ष के अनुसार, जेलों में बंद कुल कैदियों में से 22,946 कैदी विचाराधीन हैं। यानी प्रदेश की जेलों में हर दूसरा कैदी ऐसा है, जिस पर अभी तक दोष सिद्ध नहीं हुआ है और उसके मामले अदालत में लंबित हैं।

आधे कैदी अब भी विचाराधीन

प्रदेश की जेलों में बंद कुल कैदियों में लगभग 50 प्रतिशत विचाराधीन हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो वर्षों से सुनवाई पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं।उमंग सिंघार ने कहा कि विचाराधीन कैदियों में आदिवासी समाज की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक 21 प्रतिशत विचाराधीन कैदी आदिवासी हैं, जो देश में सर्वाधिक है। इसके अलावा 19 प्रतिशत दलित और 40 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं। इस तरह प्रदेश की जेलों में 80 प्रतिशत विचाराधीन कैदी सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों से हैं।

 कमजोर वर्गों की भारी मौजूदगी

मध्यप्रदेश की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में 21 प्रतिशत आदिवासी, 19 प्रतिशत दलित और 40 प्रतिशत ओबीसी समुदाय से हैं। कुल मिलाकर 80 प्रतिशत कैदी आदिवासी, दलित और ओबीसी वर्ग से आते हैं।नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि गरीबी, अशिक्षा और जमानत की राशि न जुटा पाने की मजबूरी कमजोर वर्गों को लंबे समय तक जेल में रहने को मजबूर कर रही है। न्याय में देरी इन लोगों के लिए सजा से कम नहीं है।

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दोषी कैदियों में भी वही तस्वीर

प्रदेश में करीब 22 हजार सजायाफ्ता कैदी हैं, जिनमें लगभग 50 प्रतिशत आबादी आदिवासी और दलित वर्ग की है।उमंग सिंघार ने सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत साफ कर चुकी है कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने जेलों की खराब स्थिति पर नाराजगी जताते हुए राज्य सरकारों को सुधारों के निर्देश दिए थे।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार बिना दोष सिद्ध हुए वर्षों तक जेल में रखना व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने विचाराधीन कैदियों की नियमित समीक्षा और जमानत प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दिया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मांग की कि सरकार और न्यायपालिका मिलकर विचाराधीन मामलों की शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करें, जमानत प्रक्रिया को आसान बनाएं और जेल सुधारों को प्राथमिकता दें, ताकि न्याय वास्तव में कमजोर वर्गों तक पहुंच सके।

 



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