महाराष्ट्र साहित्य सभा द्वारा 64वें शारदोत्सव का आयोजन सोमवार को इंदौर स्थित मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति में किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने स्वामी विवेकानंद के कालजयी विचारों और उनके आधुनिक संदर्भों पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि विवेकानंद ने धर्म और राष्ट्र को कभी अलग नहीं माना और हमेशा कर्मयोग पर जोर दिया। वे कहते थे कि मंदिर में बैठकर भागवत गीता पढ़ने के बजाय मैदान में जाकर फुटबॉल खेलो, फुटबॉल जितनी ऊंची जाएगी, तुम उतने ही ईश्वर के करीब पहुंचोगे। उनके विचार आज भी हमें प्रेरित करते हैं और आंदोलित भी करते हैं।
मुख्य वक्ता के रूप में अमर उजाला डिजिटल के संपादक जयदीप कर्णिक ने स्वामी विवेकानंद के विचारों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनके विचार कालजयी थे। उन्होंने हमेशा कर्मयोग पर बल दिया। वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। फुटबॉल खेलते थे, संगीत सीखते थे और हर क्षेत्र में सक्रिय थे। हालांकि उनकी जीवन यात्रा आसान नहीं रही। वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक पैदल घूमे, कई दिनों तक भूखे रहे। इन्हीं संघर्षों के बीच नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद बने।
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उन्होंने कहा कि रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद की जोड़ी ने देश के उद्धार के लिए जन्म लिया। उन्होंने अल्प जीवन जिया, लेकिन देश को एक सशक्त विचार दिया। विवेकानंद ने धर्म और राष्ट्र को कभी अलग नहीं रखा। वे मानते थे कि धर्म माध्यम है और ईश्वर एक है। उन्होंने अन्य धर्मों को भी समझा और उनका सम्मान किया। विवेकानंद ने स्वतंत्रता के बाद के भारत के उद्धार की कल्पना की और उसी को अपना ध्येय बनाया। वे कभी अपने लक्ष्य से नहीं भटके। विवेकानंद ने शिकागो की विश्व धर्म सभा में भारत को एक नई पहचान दिलाई। इसके बाद दुनिया का भारत को देखने का नजरिया बदला। उन्होंने देश को स्त्री शिक्षा के महत्व से भी परिचित कराया।
जयदीप कर्णिक ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को ‘जेन जी’ कहा जाता है, ऐसी पीढ़ी जो सवाल पूछती है, जिसमें गुस्सा भी है और बेचैनी भी। यह पीढ़ी जवाब तलाशने घर से बाहर निकलती है। पहले भी युवाओं ने यही किया, लेकिन लक्ष्य के साथ आगे बढ़े और महापुरुष बने। कार्यक्रम के अतिथि और प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान के संचालक विपिन जोशी ने कहा कि महापुरुषों के विचार काल से परे होते हैं। श्रीकृष्ण की गीता पर धर्म की परिभाषा आधारित है। महापुरुषों के विचार हमेशा सही दिशा दिखाते हैं। उन्होंने नई पीढ़ी में मराठी भाषा को समृद्ध करने के लिए मराठी में संवाद पर भी जोर दिया। साहित्य सभा के अध्यक्ष अश्विन खरे ने बताया कि सभा के माध्यम से वर्ष भर साहित्यिक गतिविधियों का संचालन किया जाता है। शारदोत्सव के तीन दिवसीय आयोजन में भी सार्थक संवाद हुआ। कार्यक्रम में गिरीश पटवर्धन और प्रदीप चौधरी ने भी अपने विचार रखे। संचालन लोकेश निम्बगांवकर ने किया, जबकि आभार पंकज टोकेकर ने माना।
