मध्य प्रदेश में बिगड़ती वायु गुणवत्ता को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने कड़ा रुख अपनाया है। सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल ने बुधवार को पारित आदेश में प्रदेश के कई बड़े शहरों की हवा को गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा करार दिया है। अधिकरण ने साफ कहा है कि हालात अब चेतावनी के नहीं, बल्कि तत्काल कार्रवाई के हैं। यह आदेश मूल आवेदन क्रमांक 192/2025 पर पारित किया गया, जिसे भोपाल निवासी राशिद नूर खान ने दायर किया था। मामले में उनकी ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन तिवारी ने पक्ष रखा।

भोपाल सहित 8 शहर नॉन-अटेनमेंट, मानकों से कई गुना ज्यादा प्रदूषण

एनजीटी ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, सागर और सिंगरौली को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) पहले ही नॉन-अटेनमेंट सिटी घोषित कर चुका है। इन शहरों में पिछले पांच वर्षों से PM₁₀ और PM₂.₅ का स्तर लगातार राष्ट्रीय मानकों से ऊपर बना हुआ है। भोपाल की स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए अधिकरण ने कहा कि यहां PM₁₀ का वार्षिक औसत 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और PM₂.₅ का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया है, जो तय सीमा से कई गुना अधिक है।

झीलों की नगरी’ अब धुंध और जहरीली हवा में घिरी

एनजीटी ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कभी झीलों की नगरी कहलाने वाला भोपाल अब सर्दियों में लगातार धुंध, बेहद कम दृश्यता और बहुत खराब से गंभीर श्रेणी के एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) से जूझ रहा है। रियल-टाइम आंकड़ों के अनुसार कई रातों में AQI 300 के पार पहुंच चुका है, जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक स्तर है।

पराली से लेकर पटाखों तक,हर मोर्चे पर नाकामी

अधिकरण ने स्पष्ट किया कि प्रदूषण किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से बढ़ रहा है। इनमें पराली जलाना, निर्माण और विध्वंस कार्यों से उड़ती धूल, वाहनों का उत्सर्जन, खुले में कचरा जलाना, लैंडफिल में आग, पटाखों का उपयोग और औद्योगिक गतिविधियां शामिल हैं।

दिल्ली में GRAP, MP में क्यों नहीं? NGT का सवाल

एनजीटी ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जहां दिल्ली-एनसीआर में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) और एयर-शेड आधारित नीति लागू है, वहीं मध्यप्रदेश में अब तक कोई प्रभावी राज्यस्तरीय तंत्र तैयार नहीं किया गया है। इसी वजह से हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।

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सात सदस्यीय हाई-लेवल कमेटी गठित, MPPCB नोडल एजेंसी

मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर एक उच्चस्तरीय संयुक्त समिति गठित की है। इसमें पर्यावरण, नगरीय विकास, परिवहन, प्रदूषण नियंत्रण और केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों के साथ CPCB के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी डॉ. रवि प्रकाश मिश्रा को भी शामिल किया गया है। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोडल एजेंसी बनाया गया है। समिति को छह सप्ताह के भीतर स्थिति का आकलन कर कार्रवाई रिपोर्ट के साथ विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए हैं।

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18 मार्च को अगली सुनवाई, सरकार की होगी परीक्षा

एनजीटी ने मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च 2026 तय की है। तब तक राज्य सरकार को यह बताना होगा कि उसने जहरीली हवा से जनता को बचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए। यह आदेश मध्यप्रदेश में वायु प्रदूषण नियंत्रण, प्रशासनिक जवाबदेही तय करने और ठोस राज्यस्तरीय नीति लागू करने की दिशा में एक बड़ा और दूरगामी न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।

 



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