अधिकमास के दौरान रविवार शाम 6 बजे इंद्रानगर स्थित श्री पुरुषोत्तम सागर पर आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। भक्तों की भीड़, जल की हल्की लहरों और 21 वैदिक ब्राह्मणों के कंठ से गूंजते “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्रोच्चार के बीच भगवान श्री पुरुषोत्तम नारायण का भव्य नौका विहार संपन्न हुआ। फूलों से सजी नौका के मध्य पीताम्बर धारण किए भगवान श्री पुरुषोत्तम नारायण विराजमान थे। बाबा गुमानदेव हनुमानगढ़ी के गादीपति ज्योतिर्विद पं. चंदनश्यामनारायण व्यास ने विधिवत पूजन-अर्चन एवं आरती की। आरती के दौरान सागर का मनोरम दृश्य श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर गया।

सनातन धर्म में अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इसी अवसर पर इंद्रानगर स्थित शास्त्र-वर्णित श्री पुरुषोत्तम सागर पर यह विशेष धार्मिक आयोजन किया गया। ब्रह्मलीन ज्योतिर्विद पं. श्यामनारायण व्यास की स्मृति में आयोजित इस अनुष्ठान में श्रद्धा, भक्ति और वैदिक परंपराओं का सुंदर संगम देखने को मिला।

कार्यक्रम की शुरुआत श्री पुरुषोत्तम सागर तीर्थ के पंचामृत पूजन से हुई। पं. चंदनश्यामनारायण व्यास ने बताया कि तीर्थ का दुग्ध, दही, घृत, मधु और शर्करा से अभिषेक किया गया। इसके पश्चात भगवान को पीताम्बर अर्पित कर विशेष श्रृंगार किया गया। पं. अधीश द्विवेदी के आचार्यत्व में 21 वैदिक ब्राह्मणों ने सामूहिक रूप से पुरुषसूक्त का पाठ किया। वेदमंत्रों, शंखनाद और घंटियों की ध्वनि से पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत हो उठा। आचार्य मंडल में पं. गोपालकृष्ण दवे, पं. दिनेश रावल, पं. जयंत द्विवेदी, पं. विजय तिवारी, पं. चंद्रशेखर शर्मा और पं. कृष्णकांत पंड्या प्रमुख रूप से शामिल रहे।

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क्यों विशेष है पुरुषोत्तम सागर का नौका विहार?


पं. चंदनश्यामनारायण व्यास ने बताया कि शास्त्रों में वर्णित सप्त सागरों में से एक पुरुषोत्तम सागर है। इसी के नाम पर अधिकमास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। मान्यता है कि इस माह में भगवान विष्णु स्वयं पुरुषोत्तम स्वरूप में भक्तों के बीच निवास करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, जो श्रद्धालु इस नौका विहार का दर्शन करता है, वह भवसागर से पार होने का पुण्य प्राप्त करता है। यह नौका विहार जीवन रूपी नैया को पार लगाने का प्रतीक माना जाता है, जिसमें भगवान स्वयं खेवनहार बनते हैं।

फूलों से सजी नौका में विराजे भगवान


नौका विहार के लिए नाव को गेंदे, गुलाब और मोगरे के फूलों से आकर्षक ढंग से सजाया गया था। भगवान श्री पुरुषोत्तम नारायण को पीताम्बरी वस्त्र, स्वर्णाभूषण और वैजयंती माला धारण कराई गई। ढोल-नगाड़ों तथा “नारायण-नारायण” के जयघोष के बीच भगवान को नौका में विराजित कर सागर की परिक्रमा कराई गई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने तट पर खड़े होकर पुष्पवर्षा की। पूरा वातावरण “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” के जाप से गुंजायमान रहा। अनेक श्रद्धालुओं ने सागर के जल का आचमन कर स्वयं को धन्य माना।

क्या है अधिकमास का पौराणिक महत्व?


हिंदू पंचांग के अनुसार लगभग प्रत्येक तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त माह जुड़ता है, जिसे अधिकमास, मलमास अथवा पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार स्वामीविहीन होने के कारण इस मास का तिरस्कार किया जाता था। तब यह भगवान विष्णु की शरण में पहुंचा। भगवान ने इसे अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान करते हुए कहा कि यह माह उनके नाम से जाना जाएगा और इसमें किए गए जप, तप, दान तथा पुण्य कार्यों का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होगा। तभी से यह मास विशेष रूप से पूजनीय माना जाता है।

श्रद्धालुओं में दिखा उत्साह


नौका विहार के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरुषोत्तम सागर पहुंचे। फ्रीगंज निवासी कमला बाई ने बताया कि वह वर्षों से प्रत्येक अधिकमास में इस आयोजन में शामिल होती हैं। उनके अनुसार, “जब भगवान नौका में विराजमान होकर सागर की परिक्रमा करते हैं, तो ऐसा लगता है मानो साक्षात बैकुंठ के दर्शन हो रहे हों।” आयोजन समिति द्वारा प्रसादी एवं पेयजल की व्यवस्था की गई थी। सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस बल भी तैनात रहा। देर शाम महाआरती के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।



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