भोजशाला मामले में मंगलवार को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने अपने तर्क रखे। उन्होंने इस केस में धार दरबार के दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 1935 में भोजशाला को मस्जिद घोषित किया गया था, क्योंकि पूर्व से परिसर में नमाज अदा की जाती थी।

इस अधिसूचना का गजट में भी नोटिफिकेशन है। उन्होंने पुरातत्व स्मारक अधिनियम 1904 का हवाला देते हुए कहा कि उस समय स्थानीय प्राधिकरणों को स्मारकों को संरक्षित घोषित करने का अधिकार प्राप्त था, जो बाद में केंद्र सरकार को स्थानांतरित कर दिया गया। इस कारण धार दरबार का निर्णय पूरी तरह विधिसम्मत है।

 

उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी संपत्ति के स्वामी का पता हो तो सरकार विधिवत प्रक्रिया अपनाकर उसे अधिग्रहित कर सकती है, लेकिन यदि स्वामी अज्ञात हो तो सरकार का उस संपत्ति पर स्वामित्व नहीं रहता। ऐसी स्थिति में सरकार को राज्य के प्रचलित भूमि अधिग्रहण कानूनों का पालन करना जरूरी होता है।

इस संपत्ति का भी विधिवत अधिग्रहण नहीं किया गया है। यह भी तर्क रखा गया कि ऐसे कोई ठोस साक्ष्य नहीं हैं जिनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि संबंधित स्थल मंदिर है और सरकार ने विधिवत रूप से उसे अधिग्रहित कर संरक्षित स्मारक घोषित किया हो। इस विवाद का परीक्षण धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि विधि के स्थापित सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए।

 

पक्षकारों को कराए गए फुटेज मुहैया


हाईकोर्ट के निर्देश पर एएसआई ने इस याचिका से जुड़े सभी पक्षकारों को सर्वे के दौरान की गई वीडियोग्राफी के फुटेज मुहैया कराए। कोर्ट ने पिछली सुनवाई में इस संबंध में आदेश दिए थे। अब वीडियोग्राफी के तथ्यों के आधार पर पक्षकार अपनी बात रख सकते हैं। वीडियोग्राफी की मांग मुस्लिम पक्ष की ओर से की गई थी। एएसआई ने 98 दिन तक सर्वे कर भोजशाला की रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत की है।



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