अपने जन्म के समय से इंदौर मध्य भारत का अग्रणी नगर रहा है। मध्य प्रदेश में आज यह चिकित्सा के क्षेत्र में प्रथम स्थान पर है, क्योंकि देश के सभी बड़े अस्पताल समूह इंदौर में हैं। शुरुआत में वैद्य, हकीम और आयुर्वेद के साथ झाड़-फूंक से इलाज का चलन था। सामान्य जन मानस का पुरातन चिकित्सा पर अधिक विश्वास था। अंग्रेजी इलाज पर हर किसी का विश्वास नहीं था, लेकिन राजवाड़ा के समीप गोपाल मंदिर के पास पाश्चात्य चिकित्सा से इलाज का दवाखाना आरंभ किया गया था, हालांकि, इस पर लोगों को विश्वास नहीं था।
अस्पताल को जला दिया गया था
अंग्रेजी चिकित्सा के प्रति कई भ्रांतियां इंदौर के लोगों में प्रचलित थीं। लोगों में यह भय था कि यूरोपीय इलाज आम आदमी के लिए खतरा है। 1857 के विद्रोह में नगर में हलचल थी। इसी का लाभ उठा कर जनता ने अपना गुस्सा विदेशी लोगों के प्रति जाहिर करने के उद्देश्य से इस अस्पताल में आग लगा दी थी।
रेसीडेंसी में आरंभ हुआ मेडिकल स्कूल
इंदौर में अंग्रेजी चिकित्सा की उचित सुरक्षा के अभाव और लोगों की अरुचि के चलते विशेष सैन्य छावनी रेसीडेंसी क्षेत्र में 1878 में अंग्रेज अधिकारी ब्लूमांट के प्रयासों से किंग एडवर्ड मेडिकल चिकित्सालय आरंभ हुआ था। इससे पूर्व 1870 में अंग्रेजी चिकित्सा का प्रयास हो चुका था। मेडिकल चिकित्सालय में छात्र पढ़ने के लिए तैयार नहीं थे। प्रथम बैच में मात्र चार छात्र थे, उन्हें भी भी छह रुपये प्रति माह छात्रवृत्ति प्रदान की जाती थी। 1891 में इस मेडिकल स्कूल में पहली महिला शांतिबाई खोत ने प्रवेश लिया था। धीरे-धीरे अंग्रेजी चिकित्सा में विश्वास बढ़ता गया और छात्रों की संख्या में वृद्धि होती गई। बाद में यही मेडिकल स्कूल वर्तमान का महात्मा गांधी स्मृति मेडिकल कॉलेज बनकर नगर में विद्यमान है।