विवाह की वैधता का निर्णय सक्षम न्यायालय ही करेगा। …और पढ़ें

HighLights
- बालिग को मर्जी से जीने का हक
- पहले पति का दावा और विवाद
- लिव-इन नहीं है वैध विवाह
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए बालिग युवती को अपनी इच्छा के अनुसार रहने की स्वतंत्रता दे दी है। हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि युवती याचिकाकर्ता के साथ रहती है तो इससे उनके संबंध को स्वतः वैध विवाह का दर्जा नहीं मिल जाएगा। विवाह की वैधता का निर्णय सक्षम न्यायालय ही करेगा।
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति दीपक खोत की खंडपीठ ने यह आदेश अभिषेक गुर्जर द्वारा दायर याचिका पर दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि युवती को उसके पिता ने अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है।
याचिकाकर्ता का दावा था कि उसने 25 मार्च 2026 को धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार युवती से विवाह किया था और युवती करीब ढाई माह की गर्भवती है। साथ ही आरोप लगाया गया कि एक जून को पुलिस की मदद से युवती को जबरन उसके पिता के घर ले जाया गया। सुनवाई के दौरान पुरानी छावनी थाना पुलिस युवती को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया।
इसी बीच ब्रजेश गुर्जर नामक व्यक्ति ने हस्तक्षेप आवेदन प्रस्तुत कर दावा किया कि युवती का विवाह पहले उससे हो चुका है। उसने अपने दावे के समर्थन में विवाह कार्ड और फोटो भी न्यायालय में पेश किए। न्यायालय ने हस्तक्षेप आवेदन स्वीकार कर उसे पक्षकार बनने की अनुमति दी। खंडपीठ ने युवती से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। युवती ने स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ता अभिषेक गुर्जर के साथ रहने की इच्छा जताई। राज्य पक्ष ने भी बताया कि युवती बालिग है और उसकी जन्मतिथि एक जनवरी 2008 है। इसके बाद न्यायालय ने कहा कि चूंकि युवती बालिग है, वह अपनी इच्छा के अनुसार कहीं भी रहने के लिए स्वतंत्र है।
