धार के ऐतिहासिक भोजशाला परिसर से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई सर्वे से संबंधित याचिकाओं पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा कि मुस्लिम पक्ष अपनी सभी शिकायतों और साक्ष्यों की मांग को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख करे।

मामले को लेकर वकील विष्णु शंकर जैन ने सोशल मीडिया X पर ट्वीट कर कहा कि भोजशाला मामले के संबंध में, आज मौला कमालुद्दीन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दायर की गई थी। इस याचिका में मुख्य मांग यह थी कि ASI सर्वे के संबंध में 11 मार्च, 2024 के कोर्ट के आदेश के पालन में की गई वीडियोग्राफी की एक कॉपी उन्हें भी उपलब्ध कराई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने आज इस मामले का निपटारा करते हुए कहा कि वीडियोग्राफी के संबंध में उनकी जो भी आपत्तियां होंगी, उन पर हाई कोर्ट विचार करेगा। इस मामले से जुड़ी सुनवाई 2 अप्रैल को हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के समक्ष शुरू होनी है।

 

हाईकोर्ट की कार्यवाही से असंतुष्टि के बाद पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट

इस मामले में मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रही कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच की कार्यवाही पर असंतोष जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सोसायटी ने अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी।

 

सुनवाई की तारीख को लेकर उठाई आपत्ति

मुस्लिम पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत विशेष आवेदन में कहा गया कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में 2 अप्रैल को प्रस्तावित सुनवाई से पहले 1 अप्रैल को ही उनकी आपत्तियों पर विचार किया जाए। सोसायटी का तर्क था कि उनकी बात सुने बिना आगे की प्रक्रिया उचित नहीं होगी।

 

वीडियोग्राफी और साक्ष्यों का मुद्दा प्रमुख

सोसायटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने बताया कि 11 मार्च को एएसआई द्वारा किए जा रहे सर्वे की वीडियोग्राफी उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। उनका आरोप है कि 16 मार्च की सुनवाई के दौरान इस मुद्दे पर न तो चर्चा हुई और न ही कोई स्पष्ट आदेश दिया गया।

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मूल याचिका की वैधता पर भी उठे सवाल

कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा दायर मूल याचिका की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं। सोसायटी का कहना है कि यह याचिका सुनवाई के योग्य नहीं है, फिर भी मामले को आगे बढ़ाया जा रहा है।

 

आगे की कार्यवाही पर टिकी निगाहें

इन सभी कानूनी और तकनीकी आधारों पर सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की गई थी, हालांकि अदालत ने इसे अस्वीकार करते हुए हाईकोर्ट जाने की सलाह दी है। अब इस संवेदनशील मामले में आगे की कार्यवाही और निर्णय को लेकर सभी की निगाहें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पर टिकी हैं।

 





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