इंदौर के भागीरथपुरा में न केवल नगर निगम, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की भी गंभीर लापरवाही सामने आई है। इस बस्ती में 22 दिसंबर से ही मरीज सामने आने लगे थे। यहाँ रहने वाले ज्यादातर परिवार गरीब हैं। बीमार होने पर वे सरकारी डिस्पेंसरी भी जा रहे थे, लेकिन फील्ड टीम ने मुख्य स्वास्थ्य कार्यालय तक इसकी जानकारी नहीं पहुँचाई, जबकि बस्ती में आशा और ऊषा कार्यकर्तां तैनात हैं।

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बस्ती की केमिस्ट शॉप्स पर लगातार उल्टी-दस्त के मरीज दवाएँ लेने आ रहे थे और क्लिनिकों में भारी भीड़ लग रही थी, फिर भी विभाग मामले की गंभीरता को नहीं समझ सका। जब 28 दिसंबर को 18 मरीज दो निजी अस्पतालों में भर्ती हुए और उन्हें देखने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय पहुँचे, तब इस बात का खुलासा हुआ कि बस्ती के लोग डायरिया और हैजे  के शिकार हुए हैं। 29 दिसंबर को जब पहली मौत हुई, तो स्वास्थ्य विभाग उसे ‘दिल का दौरा’ बताता रहा, लेकिन बाद में पुष्टि हुई कि मौत की वजह डायरिया ही थी।

रोज आ रहे थे 50 से ज्यादा मरीज



भागीरथपुरा में क्लिनिक संचालित करने वाले डॉ. विनोद पांडे ने बताया कि पिछले दस दिनों से मरीज आने लगे थे। वे उल्टी और दस्त की शिकायत लेकर आ रहे थे। यह बीमारी आमतौर पर दूषित पानी के सेवन से होती है। 25 दिसंबर के बाद तो मरीजों की संख्या प्रतिदिन 50 से ज्यादा होने लगी थी।

 



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