दूषित पानी के कारण इंदौर के भागीरथपुरा में हुई पंद्रह मौतों का गम उन परिवारों को ज्यादा है, जिन्होंने अपनों को खोया है। अब तक बचे सरकारी अफसरों ने अपनी नौकरी खोने के डर से भागीरथपुरा बस्ती को पिपली लाइव बना दिया। इस घटना ने इंदौर के माथे पर कलंक लगा दिया। सफेद एप्रेन पहने स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी गोली ले लो गोली.. की मासूम पुकार के साथ घरों की कुंडियां ठोक रहे हैं।

 

सरकारी डिस्पेंसरी दवा के खोकों से भर गई है। रिपोर्टें बन रही हैं, जांचें हो रही हैं। राहत के चेक बांटे जा रहे हैं। आशा-उषा कार्यकर्ता निशा होने तक ड्यूटी निभा रही हैं। बस्ती के गरीब पूछ रहे हैं ये सब पहले क्यों नहीं हुआ, जब हम महीने भर से गंदे पानी को लेकर चिल्ला रहे थे। अब आए हो हमारी मौत का तमाशा देखने…।

 

दोषी अफसरों ने पहले नलों में गंदा पानी बहाया। अब अपनी नौकरी बचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अभी तक तो मातहतों पर गाज गिरी, लेकिन जब उमा भारती, राहुल गांधी के ट्वीट वायरल हुए तो भागीरथपुरा ‘राष्ट्रीय मुद्दा’ बन गया। कोर्ट में भी खिंचाई शुरू हो गई सो अलग। भोपाल की चिंता भी वाजिब थी। वहां से चले आदेश के बाद आखिरकार घटना के लिए जिम्मेदार माने जा रहे दो अफसरों का बोरिया बिस्तर भी इंदौर से बंध गया।

 

जिस भागीरथपुरा में कोई अफसर वर्षों तक झांकने नहीं गया। अब उस बस्ती में सुबह नल आने के समय बड़े-बड़े आईएएस आकर पानी सूंघ-सूंघ कर देख रहे हैं। रिपोर्ट तैयार की जा रही है। नगर निगम के बहादुर अफसरों ने चार दिन पहले शौचालय के नीचे नर्मदा लाइन का लीकेज खोजकर सुर्खियां बटोरी, लेकिन आत्मविश्वास डगमगा गया, इसलिए फिर सड़कें उखाड़-उखाड़ कर नर्मदा में गंदे पानी की मिलावट के ‘संगम’ को खोजा जा रहा है।

 

अब डिस्पेंसरी रात तक मरीजों के इलाज के लिए खुली है। डॉक्टर नाइट ड्यूटी निभा रहे हैं। चार-पांच एम्बुलेंस बस्ती में तैनात हैं। स्वास्थ्य विभाग ने दूषित पानी की मिलावट की रिपोर्ट बता कर अपना पल्ला झाड़ दिया, लेकिन जब बस्ती में लोग बीमार पड़े तो विभाग को होश नहीं था। उषा-आशा कार्यकर्ता क्या कर रही थीं? बस्ती तक जो मुख्य मार्ग जाता है। रात को वहां पुलिस ने बैरिकेड लगाकर शराब पीने वालों की जांच मशीनों से की। बस्ती वाले बोल रहे थे कि ‘शराब पीने वालों की जांच रोज होती है। गंदा पानी पीने वालों की जांच कर लेते तो इतनी मौतें नहीं होती।’

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।



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