राजधानी भोपाल में एक ऐसी भावुक और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई, जिसने समाज की पारंपरिक सोच को चुनौती दी। सागर के प्रसिद्ध सामाजिक व्यक्तित्व शिव नारायण नामदेव उर्फ ‘शिब्बू नामदेव’ के निधन के बाद उनकी बेटियों ऋषिका और रुचिका नामदेव ने अंतिम संस्कार की सभी रस्में निभाकर बेटा-बेटी के भेद को मिटाने का सशक्त संदेश दिया।

यह घटना न केवल महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है, बल्कि उन धारणाओं को भी चुनौती देती है, जहां वंश चलाने के लिए पुत्र को ही प्राथमिकता दी जाती है।  मूल रूप से सागर निवासी शिव नारायण नामदेव सामाजिक सक्रियता के कारण पूरे क्षेत्र में जिनको ‘शिब्बू नामदेव’ नाम से पहचाने जाते थे। उन्होंने  सामाजिक पहल कीं जैसे सामूहिक विवाह सम्मेलन, जरूरतमंद छात्रों की आर्थिक सहायता और सामाजिक सहयोग के अन्य कार्य। 4 मार्च को उन्हें सागर में ब्रेन स्ट्रोक आया, जिसके बाद उन्हें भोपाल लाकर अस्पताल में भर्ती कराया। पिछले एक सप्ताह से उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। शनिवार को उनका निधन हो गया। 

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बेटियों ने दिया कंधा, स्वयं की मुखाग्नि

सोमवार को निकली अंतिम यात्रा में एक भावुक दृश्य देखने को मिला। बेटियों ने न केवल अपने पिता के पार्थिव शरीर को कंधा दिया, बल्कि मुक्तिधाम पहुंचकर पूरे विधि-विधान के साथ उन्हें मुखाग्नि भी दी। हिंदू परंपराओं में जहां यह अधिकार सामान्यतः पुरुषों को दिया जाता है, वहीं इन बेटियों ने इस रूढ़ि को तोड़ते हुए समाज को नई दिशा देने का काम किया। 

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पिता ने बेटों की तरह जीना सिखाया

बेटियों ने भावुक होकर कहा कि “पिताजी ने हमें हमेशा बेटों की तरह आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। सागर से भोपाल तक उन्होंने हमें स्वाभिमान के साथ जीना सिखाया। आज उनके अंतिम संस्कार में मुखाग्नि देना हमारा सौभाग्य और कर्तव्य था। अंतिम संस्कार में मौजूद लोगों और सागर से आए परिचितों ने बेटियों के इस साहसिक निर्णय की सराहना की।



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