ग्वालियर-चंबल में सरसों उत्पादन मौसम और तना गलन रोग से प्रभावित हुआ। कटाई पर उपज आधी रह गई, जिससे किसानों की उम्मीदें टूटीं और नुकसान की आशंका बढ़ गई। …और पढ़ें

Publish Date: Wed, 18 Mar 2026 06:24:18 PM (IST)Updated Date: Wed, 18 Mar 2026 06:24:18 PM (IST)

ग्वालियर-चंबल में सरसों पर मौसम की मार, उत्पादन में 25% तक गिरावट के आसार
ग्वालियर-चंबल अंचल में किसानों की मेहनत पर फिरा पानी। (फोटो- एआई जनरेटेड)

HighLights

  1. सरसों की फसल में तना गलन रोग का प्रकोप बढ़ा
  2. उत्पादन घटकर प्रति बीघा दो से तीन क्विंटल रह गया
  3. सामान्य उपज पांच से छह क्विंटल प्रति बीघा होती है

ग्वालियर, नईदुनिया प्रतिनिधि। ग्वालियर-चंबल अंचल में सरसों की कटाई शुरू होते ही किसानों की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। खेतों में लहलहाती फसल देखकर जहां बेहतर उत्पादन की उम्मीद थी, वहीं कटाई के बाद वास्तविकता सामने आई तो उपज उम्मीद से काफी कम निकली।

एक बीघा जमीन से जहां 5 से 6 क्विंटल सरसों मिलती है, वहीं इस बार केवल 2 से 3 क्विंटल उत्पादन ही हो रहा है। मौसम में लगातार उतार-चढ़ाव और रोगों के प्रकोप ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

तना गलन रोग ने बिगाड़ी फसल की हालत

  • आंचलिक कृषि विज्ञान केंद्र मुरैना के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संदीप सिंह तोमर के अनुसार इस बार सरसों की फसल में तना गलन रोग (पोलियो) का प्रकोप देखने को मिल रहा है। फरवरी महीने में कभी ठंड, कभी गर्मी और बीच-बीच में बारिश से बनी नमी इस बीमारी के लिए अनुकूल साबित हुई।
  • इस रोग के कारण पौधों का विकास प्रभावित हुआ और दाना पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार कुल उत्पादन में करीब 25 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।

चंबल अंचल का प्रदेश में अहम योगदान

  • गौरतलब है कि प्रदेश में सरसों उत्पादन का बड़ा हिस्सा ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से आता है। मुरैना, भिंड और श्योपुर जिले मिलकर प्रदेश के कुल उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत का योगदान देते हैं। अकेले मुरैना जिले का हिस्सा करीब 27 प्रतिशत है।
  • प्रदेश में इस वर्ष 11 लाख हेक्टेयर में सरसों की खेती की गई है, जिससे लगभग 15.71 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया गया था। चंबल क्षेत्र का रकबा भले ही 40 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन यहां की उपजाऊ जमीन और अनुकूल वातावरण के कारण उत्पादन 50 प्रतिशत से अधिक रहता है।
  • भावांतर योजना की खुशी भी फीकी

    • राज्य सरकार द्वारा इस बार सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है और भावांतर योजना भी लागू की गई है। इससे किसानों को बेहतर दाम मिलने की उम्मीद जगी थी।
    • लेकिन कटाई के समय सामने आई वास्तविकता ने इस खुशी को फीका कर दिया। भितरवार के किसान रामनिवास यादव बताते हैं कि खड़ी फसल देखकर उन्हें अच्छे मुनाफे की उम्मीद थी, लेकिन थ्रेसिंग के बाद उत्पादन आधा भी नहीं निकला।

    मौसम की मार और देरी से बुवाई बना कारण

    • कृषि विभाग के अनुसार इस बार सरसों की कम पैदावार के पीछे कई कारण हैं। जनवरी के अंत और फरवरी की शुरुआत में हुई बारिश, उसके बाद मार्च में अचानक बढ़ी गर्मी ने फसल के विकास को प्रभावित किया।
    • दाने पूरी तरह पकने से पहले ही सूख गए, जिससे उनका आकार छोटा और वजन हल्का रह गया। इसके अलावा, मानसून के लंबे समय तक सक्रिय रहने के कारण बुवाई में देरी हुई, जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ा।

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    बारिश की आशंका से बढ़ी चिंता

    इस समय सरसों की कटाई जारी है और मौसम विभाग द्वारा बारिश की संभावना जताई जा रही है। यदि इस दौरान बारिश होती है, तो किसानों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ सकता है। एक तरफ पहले से कम उत्पादन और दूसरी ओर कटाई के दौरान फसल खराब होने का खतरा।



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