गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय के अधीन आने वाला ग्वालियर-चंबल संभाग का हजार बिस्तर अस्पताल इन दिनों सफेद हाथी साबित हो रहा है। करोड़ों की लागत से बनी इ …और पढ़ें
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नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय के अधीन आने वाला ग्वालियर-चंबल संभाग का हजार बिस्तर अस्पताल इन दिनों सफेद हाथी साबित हो रहा है। करोड़ों की लागत से बनी इस इमारत में सिस्टम की लापरवाही के कारण मरीज दम तोड़ रहे हैं।
अस्पताल की 16 में से आठ लिफ्ट खराब पड़ी हैं, जिसके चलते गंभीर मरीजों को वार्डों तक पहुंचाना जानलेवा साबित हो रहा है। अस्पताल की बदहाली का सबसे खौफनाक चेहरा बीते रोज तब देखने को मिला जब मुख्तियार सिंह नामक मरीज की जान सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि समय पर लिफ्ट नहीं मिली। जब तक स्वजन उनको एक लिफ्ट से दूसरी लिफ्ट तक ले जाने की जद्दोजहद करते रहे, तब तक मरीज की सांसें उखड़ गईं।
प्रशासनिक सुस्ती: तीन माह से फाइलों में घूम रहा सुधार का काम
सी-ब्लाक, जहां छठी मंजिल पर आइसीयू और मेडिसिन वार्ड स्थित हैं, वहां लगी छह में से पांच लिफ्ट सोमवार को भी खराब थीं। हजार बिस्तर अस्पताल की इस दुर्दशा के पीछे प्रशासनिक सुस्ती मुख्य कारण है। नवंबर 2025 में अस्पताल प्रबंधन ने जीआरएमसी को लिफ्ट दुरुस्ती के लिए आधिकारिक पत्र भेज चुका है, लेकिन तीन माह से जीआरएमसी की टेबल से दूसरी टेबल पर पत्र घूम रहा है, लेकिन धरातल पर सुधार शून्य है। जिम्मेदार अधिकारी हर बार “जल्द मेंटेनेंस कराया जाएगा” जैसा रटा-रटाया जवाब देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।
सी-ब्लॉक की हालत सबसे ज्यादा खराब, वेंटिलेटर पर बुनियादी सुविधाएं
अस्पताल का सी-ब्लाक सबसे ज्यादा संवेदनशील है, लेकिन यहीं सबसे ज्यादा अव्यवस्था है। गंभीर मरीजों को स्ट्रेचर पर लादकर स्वजन घंटों लिफ्ट शुरू होने का इंतजार करते हैं। अस्पताल में स्ट्रेचर मिलना ही गनीमत है। यदि मिल भी जाए, तो उसे खींचने वाले कर्मचारी गायब रहते हैं। सोमवार को सोनू जाटव जैसे कई मरीजों के स्वजन को खुद स्ट्रेचर खींचकर वार्ड तक ले जाना पड़ा। एक ओर जहां सुपर स्पेशलिटी अस्पताल को एनएबीएच मान्यता मिलने का जश्न मनाया जा रहा है, वहीं जेएएच समूह के इस मुख्य अस्पताल की बुनियादी सुविधाएं वेंटिलेटर पर हैं। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति और रस्म अदायगी के लिए ही बना है, क्या आम आदमी की जान की कीमत सिर्फ एक लेटर हेड तक सीमित रह गई है।
