नईदुनिया प्रतिनिधि,ग्वालियर। जडेरूआ खुद गोला का मंदिर क्षेत्र में पुलिस की 14 बीघा बेशकीमती जमीन के मामले में पुलिस को राज्य शासन से सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति मिल गई है।

इस मामले में हाई कोर्ट ने पुलिस की री-स्टोर याचिका को खारिज कर दिया था,यह याचिका 222 दिन की देरी से पेश की गई थी और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी भी की गई थी।

इसी सप्ताह पुलिस की सुप्रीम कोर्ट में जाएगी

शासन से अनुमति मिलने के बाद अब इसी सप्ताह पुलिस की अपील सुप्रीम कोर्ट में लगाई जाएगी। पुलिस अधिकारियों ने पुराने दस्तावेज सहित पूरा रिकॉर्ड भी जुटा लिया है। उधर मौके पर पुलिस की जमीन पर दो बोर्ड पुलिस के लगे हुए हैं, क्योंकि पहले यहां कोर्ट में मामला चलने के बाद भी प्लाटिंग की जा रही थी।

यह मामला एमसीसी क्रमांक 3848/2025 (राज्य शासन बनाम रामसेवक, मृतक, एलआर के माध्यम से) से जुड़ा है। इसमें राज्य शासन ने वर्ष 2007 की रिट याचिका को बहाल करने के लिए आवेदन किया था। राज्य की ओर से बताया गया कि 12 जनवरी 2026 को पुलिस महानिदेशक द्वारा संबंधित अधिकारी पर ‘निंदा’ का दंड दिया गया है।

देरी माफी का कोई आधार नहीं बनती

यह भी माना गया कि जबलपुर पीठ के निर्णय के अनुसार निंदा दंड की अवधि केवल एक वर्ष होती है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब विभाग अपने कामकाज और अधिकारियों की कार्यप्रणाली सुधारने को गंभीर नहीं है, तो देरी माफी का कोई आधार नहीं बनती।

पुलिस विभाग अपने अधिकारियों को वास्तविक दंड देने की बजाए औपचारिक व अस्थाई सजा देने की प्रवृत्ति अपनाए हुए है। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि जानबूझकर हल्का दंड दिया गया, ताकि एक साल बाद अधिकारी को सभी लाभ मिल सकें और कोई वास्तविक सजा प्रभावी न हो।

यह भी कहा कि विभाग न तो अपने तौर-तरीकों में सुधार कर रहा है और न ही अधिकारियों को न्यायालयीन कार्यवाहियों के प्रति सतर्क बना रहा है।

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यह है मामला

जड़ेरुआ खुर्द में पुलिस विभाग की 15 सर्वे नंबर की 14 बीघा जमीन है, जो पुराने खसरों में पुलिस विभाग दर्ज है। इस पर रामसेवक ने दावा पेश किया। रामसेवक ने जमीन पर एक पक्षीय डिक्री हासिल कर ली। जब शासन को एक पक्षीय डिक्री की जानकारी मिली तो न्यायालय में आवेदन लगाया, लेकिन जिला कोर्ट से राहत नहीं मिल सकी।

इसके बाद शासन ने 2007 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की। कहा कि प्रदेश में सरकार बदलने के बाद शासकीय अधिवक्ताओं का बदलाव हुआ। यह बेशकीमती जमीन है। 2007 से याचिका लंबित थी।

2008 में रामसेवक का निधन हो गया, लेकिन पुलिस ने उसके परिजनों को याचिका में पार्टी नहीं बनाया। इसके बाद हाई कोर्ट ने तत्कालीन अधिकारी पर कार्रवाई के निर्देश दिए और इसी आदेश के परिपालन में डीजीपी ने निंदा का दंड दिया जिसका लेकर कोर्ट ने नाराजगी जताई व याचिका री-स्टोर करने में माफी देने से इंकार कर दिया।

राज्य शासन से उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए अनुमति प्राप्त हो गई है। अब पुलिस की 14 बीघा जमीन को लेकर अपील लगाई जाएगी। प्रक्रिया के तहत उच्चतम न्यायालय में अपील की जाएगी।

-अतुल सोनी, प्रकरण के ओआइसी व सीएसपी मुरार



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